~ माँ ~
घर के हर कोने से
गूँजती तेरी आवाज माँ,
आज भी आँगन की डेहरी से
तू बेटा कहकर पुकारती है,
बिखरी है हर ज़र्रे में परछाई
चारपाई में अब भी तेरी
महक महसूस कर पाता हूँ !
होली ,दीवाली में अब
कौन देखेगा राह मेरी,
कौन हलषष्ठी में मेरी
पीठ थपथपाएगा,
परवाह की मिठी डाट बिना
कैसे खुद का ख्याल रखूँगा,
ह्रदय की इस पीड़ा को
बिसरी तेरी बातो से भूलाता हूँ !
खाता हूँ जब चावल की रोटी मैं
तेरी सुरत उस पे नज़र आती है,
पहले जैसा तो स्वाद अब नहीं माँ
हर निवाले में तेरे हाथो की
खुशबू तलाशता हूँ !
तेरे जाने के बाद
ये अहसास हुआ है माँ,
की कितना सूना हुआ सफ़र
अपने ही घर में आज
अजनबी मुसाफ़िर सा ठहरा हूँ !
बहुत भीड़ है यहाँ अपनो की
पर तेरी कमी कोई भर पाता नहीं,
निःसवार्थ तेरी तपस्या से
मैंने अपना वज़ूद पाया,
अपनी बुझी उमंगों को
तेरी यादो के दिए से जलाता हूँ !
तू दूर हो कर भी करीब है
तेरा आँचल मुझे मिला
ये मेरा नसीब है,
तेरी गोदी सा आराम तो
अब मिलता नहीं माँ,
जब भी मायूस होता हूँ
तेरी चारपाई के पास बैठ
सुकून तलाशता हूँ !
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