मैं बहू हूँ, मुझे बहू ही रहने दो
"हमारी बहू तो बेटी जैसी है,"
ये शब्द मेरे अस्तित्व पर प्रहार है
क्या बस तुलना ही मेरी पहचान है
नहीं
क्योंकि.....
सबका अपना एक वजूद होता है
बेटी का अपना बहु का अपना कर्तव्य होता है,
किसी और के जैसा बनने की चाह में
अस्तित्व अपना ही कमज़ोर होता है।
क्यों 'बहू' होना एक प्रश्नचिह्न है?
क्यों उसे बेटी का प्रमाण चाहिए?
क्या बहू की अपनी कोई पहचान नहीं,
जो उसे किसी और का सम्मान चाहिए?
बेटी तो उस घर में जन्मी है
बहू अपना बचपन कहीं पीछे छोड़ आई है,
वो पराये घर से आकर अपना सब वार देती है
फिर क्यों दुनियां उसने किसी और की परछाई ढूंढती है।
मैं किसी के जैसी क्यों बनूँ ?
मैं स्वयं में ही सम्पूर्ण और खास हूँ,
मैं बेटी थी किसी और की कल तक
आज इस घर का नया और प्यारा विश्वास हूँ।
मुझे बेटी जैसा प्यार मत देना
बस बहू का मान और सम्मान देना,
मेरी कमियों पर हँसना मत कभी,
बस मेरे संघर्षों को अपनी पहचान देना।
क्योंकि आपकी हँसी आपका तंज मेरे माता पिता का अपमान करती है।
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उसे पराया नहीं, अवसर समझो।
उसके सपनों को मत रोको,
उसे उड़ान दो, पहचान दो।
जहाँ बहू मुस्कुराती है,
वहीं घर सच में बसता है।
इस कविता में शब्दों की सादगी और भावनाओं की गहराई इसे बेहद प्रभावशाली बनाती है। यह न सिर्फ बहुओं के लिए, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो अपने अस्तित्व और स्वाभिमान के लिए खड़ा होता है।
हमारा संदेश है: तुलना नहीं, सम्मान दें। ❤️