Poetry:
उत्सव बड़ा चहूं ओर हुआ , महिला दिवस अपार
घर में नारी रोज़ ही सहती, झिझक का भारी भार ॥
मंच सजे, भाषण चले उठी ताली की झंकार
रसोई तक ही फिर क्यों समझे, नारी का अधिकार ॥
फूल दिए इक दिन मगर, बाकी दिन उपहास
सम्मान उसे तब मिले, जब मिले अपनों का विश्वास ॥
माँ की ममता रोज़ है, बहना करे रोज दुलार
जीवन सजे पत्नी से, जो करे आंगन को उजियार ॥
सुख-दुख में जो साथ दे, त्यागे अपना मान
उस नारी के श्रम बिना, सूना हर सम्मान ॥
दिन विशेष से क्या मिले, यदि बदले न विचार
मन में हो आदर सदा, यही सच्चा प्यार ॥
कंधे से कंधा मिला,संकल्प को बनाती बलवान
नारी से ही श्रृष्टि की संरचना,यही बनाए वंश वृक्ष महान ॥
सम्मानित वह तब बने, जब हो अधिकार
बेटी, बहन, माँ,पत्नी सभी जीवन का आधार ॥
नारी केवल रूप नहीं, शक्ति, धैर्य, विचार
इनके चरणों से ही संपूर्ण है जीवन का हर श्रृंगार ॥
जोर-शोर से क्या मिला, यदि बदले न व्यवहार
शक्ति का सम्मान ही, शिव का है सत्कार ॥
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